दूर-दूर तक फैले विशाल आसमान की गोद में 
बहती हुई हवाएं कुछ कहती है
सुनाती है अपनी दास्तां
सालो से अविराम सफ़र करने की
बदलते वक़्त के साथ अपनी
सादगी और सौम्यता बरकरार रखने की
बिना किसी भेदभाव के 
हर किसी को जीवन देने की
पर आज
कुछ बदलाव नजर आ रहे है
उसकी सीरत में नहीं सूरत में
चेहरा झुलसा हुआ और
शरीर काला पड़ गया गया है
ऐसा लगता है कि मानो किसी ने उस
पर खूब अत्याचार किया हो
फिर भी वह बेचारी अनायस बहती रहती है
अपने बच्चो तक जीवन पहुंचाने के लिए
उसे कुछ  नहीं पता
नहीं पता कि आज उसका जो हाल है
ये उसी के लाल का कमाल है
नहीं पता कि उसने जिसे जीवन दिया 
उसी ने उसके अंगों को उखाड़ दिया
झुलसा दिया उसके बदन को
अपनी लालच की आग से
दूर कर दिया उसे अपने साथी जंगल और बाग से
नहीं पसंद उसे सुंदर, भव्य और गगनचुंबी इमारतें
कभी हरे-हरे पत्तो से सजे होते थे उसके रास्ते
पर अब वो राह कहां
अब तो सबकुछ बदल गया  है
उसकी राहों  में अब इमारतें हैं
उसे ठोकर मारते हुए
उसकी खिल्लियां उड़ाते और रौब जमाते हुए
पर वो बेचारी क्या करे
वो सिसकती है बिलखती है
पर कोई नहीं सुनता
फिर भी वह बहती है
अपने दुखों को भूल
ऊंची ऊंची इमारतों से टकराती है
ठोकरें खाते हुए 
थकती है पर रुकती नहीं 
अपनी सादगी और सौम्यता  
बरकरार रखते हुए 
वो बहती है
अपना कर्तव्य निभाती है
वो बहती है।


ABOUT THE AUTHOR

Navki Nayab is a Philosophy student of Lady Shri Ram College, New Delhi. She is an ambitious and multi-talented girl, she likes to pen-down and express flows through her poems which also got published in Prabhat Khabar Newspaper.



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